श्रीनगर। श्रीनगर स्थित संस्था ‘एसोसिएशन ऑफ टेरर विक्टिम्स इन कश्मीर’ (ATVK) ने पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) में हालिया हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए पाकिस्तानी अधिकारियों पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग और मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया है। संस्था ने इन घटनाओं को लोकतांत्रिक स्वतंत्रता पर हमला करार दिया है।
संस्था की अध्यक्ष और मानवाधिकार कार्यकर्ता तस्लीमा अख्तर ने जारी एक ज्ञापन में हाल के प्रदर्शनों के दौरान आम नागरिकों की मौत पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई अस्वीकार्य है। ATVK ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय, मानवाधिकार संगठनों और वैश्विक संस्थाओं से मामले का संज्ञान लेने तथा निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने की मांग की है।
तस्लीमा अख्तर ने संयुक्त राष्ट्र से भी हस्तक्षेप की अपील करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के तहत नागरिकों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए। वहीं, एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी ‘जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (JKJAAC) को आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत प्रतिबंधित करने के पाकिस्तान के फैसले की आलोचना की है। संस्था का आरोप है कि असहमति की आवाजों को दबाने के लिए कठोर उपाय अपनाए जा रहे हैं।
इस बीच, पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के मानवाधिकार कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक अमजद अयूब मिर्जा ने भी पाकिस्तान सरकार और सेना पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनके अनुसार, क्षेत्र में जारी अशांति की एक बड़ी वजह विधानसभा की 12 आरक्षित सीटें हैं, जिनका इस्तेमाल चुनावी परिणामों को प्रभावित करने के लिए किया जाता है।
अमजद अयूब मिर्जा ने दावा किया कि इन सीटों को समाप्त करने की मांग को अनदेखा करते हुए प्रशासन ने 27 जुलाई को चुनाव कराने की घोषणा की, जिसके विरोध में नौ जून को क्षेत्रव्यापी हड़ताल हुई। उन्होंने आरोप लगाया कि सुरक्षा बलों ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की और इस हिंसा में बच्चों समेत 200 से अधिक लोगों की मौत हुई। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
मिर्जा ने यह भी आरोप लगाया कि PoJK में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित है और पाकिस्तान वहां के राजनीतिक एवं प्रशासनिक ढांचे पर पूर्ण नियंत्रण बनाए हुए है। उनके अनुसार, हालिया विरोध प्रदर्शन क्षेत्र में बढ़ते जन असंतोष और राजनीतिक बदलाव की मांग का संकेत हैं।
@MUSKAN KUMARI
