अंकारा: नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) के सदस्य देशों के नेता इस सप्ताह अंकारा में अहम बैठक करने जा रहे हैं। यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब गठबंधन के भीतर रक्षा खर्च, रणनीतिक प्राथमिकताओं और ईरान को लेकर अमेरिका की सैन्य कार्रवाई जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। मंगलवार और बुधवार को प्रस्तावित इस बैठक में इन विषयों पर व्यापक चर्चा होने की संभावना है।
हालिया अमेरिकी सैन्य अभियान को लेकर नाटो देशों के रुख में भी स्पष्ट अंतर दिखाई दिया। कई सदस्य देशों ने ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के उद्देश्य का राजनीतिक समर्थन किया, लेकिन किसी ने भी सैन्य अभियान में प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं की। वहीं, होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा को लेकर भी कई यूरोपीय देशों ने सैन्य सहयोग से दूरी बनाए रखी, जिस पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सहयोगियों की आलोचना की।
विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय देश क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और संभावित शरणार्थी संकट को देखते हुए सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचना चाहते हैं। उनका कहना है कि इराक, अफगानिस्तान और लीबिया जैसे पिछले सैन्य अभियानों के अनुभवों ने यूरोपीय देशों को अधिक सतर्क बना दिया है।
बैठक का एक प्रमुख मुद्दा रक्षा बजट भी रहेगा। पिछले वर्ष हुए नाटो शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने वर्ष 2035 तक रक्षा खर्च को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 5 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य तय किया था। हालांकि, कई विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक चुनौतियों, बढ़ते सार्वजनिक कर्ज और घरेलू राजनीतिक दबावों के कारण सभी देशों के लिए इस लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं होगा।

इस बीच, अंकारा, इस्तांबुल और इजमिर समेत कई शहरों में नाटो विरोधी प्रदर्शन भी हुए हैं। प्रदर्शनकारियों ने रक्षा खर्च बढ़ाने का विरोध करते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण पर अधिक निवेश की मांग की है। ऐसे में अंकारा की यह बैठक नाटो की एकजुटता और भविष्य की रणनीति के लिए अहम मानी जा रही है।
@MUSKAN KUMARI
